Header Ads Widget

Responsive Advertisement

Ticker

6/recent/ticker-posts

Bala Saheb Thakrey | बाला साहब ठाकरे

 Bala Saheb Thakrey |  बाला साहब ठाकरे

आज हम बात करने वाले हैं दोस्तों एक ऐसे इंसान की जिनके बारे में ये मशहूर था की इनके मर्ज़ी के बगैर एक पत्ता तक नहीं हिलता है। शेर की बात करेंगे, एक ऐसा शेर जब ये दहारता था तो अच्छे अच्छे लोगों की हालत ख़राब हो जाती थी। बहोत आरोप-प्रत्यारोप इनपे लगें हैं, इन्हे GodFather भी कहा जाता था। संप्रदायिक हिंसा को इन्होने बढ़ावा दिया, मुस्लिमों के कट्टर विरोधी थे ये, साऊथ इंडियन, गुजराती, उत्तर भारतीय इन सब को खदेड़ो लेकिन दूसरी तरफ ये भी बोला जाता है की इन्होने बहोत लोगों की हेल्प भी की। जो भी सोचते थे उसे आगे रखने वाले, मराठियों के अधिकार को आगे बढ़ाने वाले, मराठियों के हक के लिए लड़ने वाले, पूरी हिन्दुत्व फिलोसपी के स्ट्रीम नेस्नलिस्ट बाला साहब ठाकरे या बाल केशव ठाकरे की आज हम बात करेंगे।

Bala Saheb Thakrey
Bala Saheb Thakrey

कहते हैं की जब सब कुछ फ़ेल हो जाता था तब बाला साहब को अप्रोच किया जाता था। इनका जन्म 23 जनवरी 1926 को पुणे में हुआ था, रमाबाई इनकी माता थी ऑर इनके पिता का नाम केशव सितारमन ठाकरे था जो की एक सोशल अक्टिविस्ट थे जो मराठियों के हक के लिए हमेसा आगे रहते थे, इनके पिता को प्रभोधंकर भी बोला जाता था, बाला साहब अपने पिता के काम से बहोत प्रभावित थे।

Bala Saheb Thakrey |  बाला साहब ठाकरे

बाला साहब सबसे पहले कार्टूनिस्ट थे, जी हाँ ये कार्टून बनाते थे, इनकी ड्रौइंग बहोत सुंदर होती थी। ऑर जब इनके पिता जी ने देखा ऑर इनके पिता जी के एहसास हुआ की उनका बेटा इतना टाइलेंटेड है ऑर इतना अच्छा कार्टून बनाता है तब उन्होने बाला साहब को सपोर्ट किया ऑर कहा की तुम अपने इस टैलेंट को ऑर निखरो ऑर इसी मे अपना कैरियर आगे बढ़ाओ। जबकी एक कार्टूनिस्ट होना उस समय एक अलग कैरियर था। लेकिन फिर भी एक कार्टूनिस्ट के तौर पे बाला साहब ने अपने कैरियर की शुरूआत करी। एक प्रेस मे इन्होने कुछ दिन जॉब की, फिर The Times of India मे लगातार इनके कार्टून छपते रहे, बहोत जल्द इनको ये समझ आ गया था की इनका मन यहाँ तो लगना नहीं है। क्यूकी इनका पूरा मन था किस तरह मै मराठी मोमेंट को आगे बढ़ाऊ ऑर उनको ऊपर उठाऊँ तो सीधा उनका मन वहीं लग गया। इसीलिए उन्होने अपना मैगजीन छापना स्टार्ट कर दिया ऑर बाद मे अपना पेपर भी छापे। 1960 मे इन्होने सबकुछ छोड़ के अपने भाई श्रीकांत ठाकरे के साथ मार्मिक की शुरूआत करी, (आपको पता हो की बाला साहब अपने दस भाई-बहनों मे सबसे बड़े थे, ऑर श्रीकांत ठाकरे इनके भाई थे जिनके बेटे का नाम राज ठाकरे है, राज ठाकरे के बारे मे भी बोला जाता है की ये बाला साहब से हु बहू मिलते हैं) जिसमें ये पोलिटिसियन पे व्यंगातमक कार्टून छापा करते थे ऑर मराठी बहोत पीछे है मराठियों को जॉब्स नहीं मिल रही असपे भी कार्टून छापा करते थे। इन्होने दो पेपर निकाले एक दोपहर का सामना ऑर फिर बाद मे सामना। लेकिन इन्हें बहोत जल्दी ये पता चल गया, केवल बात करने ऑर कार्टून छापने से हालात सुधरने वाले नहीं है ऑर इनके पिता ने भी इन्हें सलाह दी की हालात अगर सुधारने हैं तो एक Origination संगठन का गठन करना होगा ऑर तब जाके 19 जून 1966 मे इन्होने शिव सेना का गठन किया। ऑर तबतक मार्मिक भी बहोत ज्यादे सफल होती है, उस समय मराठियों की कोई आवाज तो थी नहीं फिर जब लोगो ने देखा की शिव शेना नाम से एक संगठन है, मार्मिक भी बहोत काम कर रहा है ऑर कोई एक इंसान है जो मराठियों की आवाज बनके सामने आया है तब लोगों ने इनका बहोत सपोर्ट किया। ऑर इसी सपोर्ट के कारण मार्मिक धीरे धीरे बहोत ज्यादे सफल हुआ। ऑर मार्मिक की सफलता ऑर लोगों के सपोर्ट ने बाला साहब को शिव सेना का गठन करने के लिए मजबूर किया। शुरू में बहोत पिसफूल Origination थी, हमको केवल हमारा हक चाहिए, ऐसा बाला साहब ऑर इनके भाई बोलते थे की हमें केवल हमारा हक देदो हमें जॉब्स देदो लेकिन ऐसा हो नहीं रहा था, बाद में इन्होने शिव शेना की 70 साखायेँ बना दी, घर घर शिव शेना पहुँचा दी। ये एक बहोत बड़ी अचिवमेंट थीं, ऑर जब इनकी पहली रैली हुई शिवाजी पार्क में कमाल कर दिया। शिव शेना जो नाम इन्होने रखा था वो महान छत्रपती शिवाजी जी महाराज के नाम पे रखा गया था। हिन्दुत्व का नारा दिया गया था, मराठी मानुस का नारा दिया गया था, इनका कहना था जिस तरह शिवाजी जी महाराज के शिव शेना ने मुगलों की बैंड बजाई थी ठीक उसी तरह हम भी बैंड बजा देंगे अगर हमें हमारा हक नहीं मिला। हालांकि शुरू में कहीं कोई मोटिव नहीं था की हम हिंसात्मक होंगे या बहोत ज्यादे हिंसा करेंगे, इन्होने अपने इरादे साफ कर दिये थे की हिंसा हमारा मोटिव नहीं है हमें बस हमारा हक दे दो, ऑर जो भी महारास्ट्रा में रह रहे है वो ठीक से रहें। लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। जैसे जैसे पोलटिकल पार्टी बड़ी होती गयी प्रॉब्लेम्स होने शुरू होते गए, सबसे पहले जो इनके टार्गेट पे आए, “लूँगी हटाओ पुंगी बजाओ” मतलब साउथ इंडियन ऑर गुजराती, स्पेसिली साउथ इंडियन। जब पहली रैली इनकी शिवाजी पार्क में हुई थी उस रैली में इतनी भीड़ ऑर इतना सपोर्ट मिला था की उसी समय बाला साहब को ये आभाष हो गया था अगले 30-40 साल में ये कहा तक पाहुचेंगे अब केवल जरूरत थी एक टार्गेट की, उस समय टॉप के रैंक पे साउथ इंडियन बैठे थे, जो जॉब्स थी वो साउथ इंडियन ऑर गुजराती को उस समय काफी दी जाती थी मराठियों को नहीं दी जाती थी, फैक्ट्रीज ऑर मिल्स में भी ज्यादेतर साउथ इंडियन ऑर गुजराती को ही रखा जाता था ऑर अगर मराठी को रखा भी जाता तो ऊँची पोस्ट नहीं दी जाती थी, तो इनका पहला टार्गेट साउथ इंडियन हि बना। इनहोने ने मार्मिक मे एक पूरी लिस्ट ही छाप दी साउथ इंडियन ऑर गुजराती कोन-कोन किस पोस्ट पे ऑर मराठी के  लिस्ट में कोन किस पोस्ट पे है, ओर इस तरह रोज मराठी लोग शिव शेना के दफ्तर आने लगे की मै बेरोज़गार हूँ मुझे काम नहीं मिल रहा है, ऑर इसके बाद शिव सैनिक ये कोशिश करते थे की इन्हें जॉब मिले ऑर इनका घर अच्छे से चले, ऑर इसी तरह धीरे-धीरे लोग बाला साहब के पास पर्सनल प्रॉब्लेम्स भी लाना शुरू कर देते हैं।

Bala Saheb Thakrey |  बाला साहब ठाकरे

1969 में हिंसा भड़काने साउथ इंडियन ऑर गुजरातियों को परेशान करने के आरोप में इन्हें आएरेस्ट भी किया जाता है लेकिन आएरेस्ट करने के विरोध में पूरा मुंबई जलने लगता है। ऑर दंगा इतना भयावह होता है की police तो छोड़िए Chief Minister भी इस दंगे को सांत नहीं कर पाते है, बाला साहब जेल में होते हैं ऑर फिर Chief Minister बाला साहब से request करते हैं ऑर जो काम Police ऑर Chief Minister नहीं कर पाते हैं वो बाला साहब की एक आवाज ने कर दिया ऑर दंगा सांत हो गया, ये ताकत थी बाला साहब की, लोग भगवान मानते थे उनहें।

धीरे धीरे ये लोकल इलैक्शन भी लड़ते हैं, 1975 में ये Emergency का सपोर्ट करते हैं ऑर इन्दिरा जी के साथ खड़े रहते हैं लेकिन बाद में ये बी॰ जे॰ पी॰ से जुड़ जाते हैं। फिर धीरे धीरे हिन्दुत्व का मुद्दा उठाते हैं। बाला साहब हिटलर के मुरीद थे हालांकी वो हिटलर के हर बातों को सपोर्ट नहीं करते थे, लेकिन उनका कहना था की अगर हिन्दुत्व को बढ़ाना है तो हिटलर जैसा लीडर यहाँ होना चाहिए। बाला साहब लोगों की बहोत मदद करते थे, जो भी फरियादी इनके पास आता था अगर वाकेय वो मुसीबत में था तो बाला साहब उनकी मदद करते थे, इनकी संगठन से बहोत पढ़े लिखे लोग, सी॰ ए॰, इंजीनियर, वकील, आइ॰ एस॰, आइ॰ पी॰ एस॰ भी जुड़ने लगें, हालांकि बाद में कुछ लोग इनहें छोड़ के जाने भी लगे। इसी बीच 1992 में बाबरी मस्जिद तोड़ा जाता है जिसमें इनका भी नाम आता है ऑर बाबरी मस्जिद के बाद 1993 में बॉम्बे ब्लास्ट होता है जिसमें इन्होने खुलेआम मुस्लिमों में आरोप लगाया ऑर अपने लोगों को सीधा कहा मारो मुस्लिमों को अगर सही से कोई महारास्ट्र में नहीं रहेगा तो हम उन्हे रहने नहीं देंगे अगर यहाँ रहना है तो रुल, लॉ एंड ऑर्डर फॉलो करो नहीं तो हम अपने हिसाब से फॉलो करवाएँगे, ऑर इनहोने ऑर्डर भी दे दिया जो इनलोगों ने हमारे साथ किया अब तुम भी जाओ ऑर उनके साथ करो, दंगा करवाने के मामले में कई बार ये आइरेस्ट भी हुए लेकिन जब भी ये आइरेस्ट होते लोंगों को संभालना बहोत मुसकिल हो जाता, लाखों की भीड़ जुड़ जाती इनको ले जाना बड़ा मुसकिल हो जाता था, ऑर फिर ये BJP को सपोर्ट करती है ऑर बाला साहब की मदद से BJP यहाँ अपनी सरकार भी बनती है, अब ये पूर्ण रूप से पॉलिटिक्स मे सक्रिय हो जाते हैं, इनके दो हाथ एक इनके बेटे उद्धव ठाकरे (जो अभी CM हैं) ऑर दूसरा इनका भतीजा राज ठाकरे, राज ठाकरे बिलकुल बाला साहब के जैसे हैं, उनके रहने का स्टाइल, बोलने का तरीका, बिलकुल बाला साहब की तरह दिखना, उन्हीं की तरह सोचना सबकुछ बाला साहब से उनका मिलता है, राज ठाकरे बाला साहब के बिलकुल कॉपी हैं, शिव शेना का सारा काम राज ठाकरे ही संभालने लगें, क्यूकी बाला साहब को उनपे पूरा विश्वास था, जो राज ठाकरे बोलते बाला साहब उनकी बातों को जरूर मानतें। जब की उद्धव ठाकरे शांत हैं। लेकिन जब बाला साहब की उम्र हुई ऑर उत्तराधिकारी की बात आई उस समय राज ठाकरे को ये लग गया की वो बाला साहब का उत्तराधिकारी नहीं बन पाएंगे क्यूकी तब तक शिव शेना के हर महत्वपूर्ण फैसले से राज ठाकरे को नज़रअंदाज़ किया जाने लगा, जो फैसला पहले खुद राज ठाकरे लिया करते थे लेकिन अब उसी फैसले से उन्हें अलग किया जाने लगा ऑर सारा फैसला उद्धव ठाकरे लेने लगे, कहा जाता है की बाला साहब बाद में पुत्र मोह मे फस गए, जब की राज ठाकरे को बाला साहब अपने पुत्र से बढ़ के मानते थे। अब जब राज ठाकरे के अहम पे बात आन पड़ी तो 2006 मे वो अलग हो गए, MNS की स्थापना कर दी हालांकि उद्धव ठाकरे ऑर राज ठाकरे एक हो जाए बहोत कोशिश की गई लेकिन ऐसा हुआ नहीं।

Bala Saheb Thakrey |  बाला साहब ठाकरे

1999 में बाला साहब को वोटिंग राइट्स से व 6 साल के लिए बैन किया गया था। ये आइरेस्ट तो कई बार हुए जेल इनका आना जाना लगा रहा लेकिन ये इतने पोवरफूल थे की इनहें कोई हाथ भी नहीं लगा सकता था। शेर थे ये। अब जब बाला साहब को ये लगा की अब बस तो उन्होने अपनी रियासत अपने पुत्र उद्धव को सोंप दिया।

बाला साहब क्रिकेट बहोत पसंद करते थे, लेकिन कार्गिल युद्ध के समय जब भारत पाकिस्तान के मैच की बात आई तो ततकालीन गृह मंत्री सुशील कुमार सिंदे ने कहा पुरानी बातें भुला के क्यूँ ना नई शुरुवात की जाए इसपे बाला साहब ने गृह मंत्री को भी धमकी दे डाली, महाराष्ट्रा क्या पूरे हिंदुस्तान में भारत पाकिस्तान का मैच होने नहीं दूँगा, देश पहले है, मै क्रिकेट को इतना भी पसंद नहीं करता की अपने वीरों के सहादत को भूल जाऊ ओर उन्होने वानखेड़े स्टेडियम को रातों रात मोबिल डाल कर ये ट्रेलर भी दिखा दिया था। उस समय बिना बाला साहब के मर्जी के एक मूवी तक महाराष्ट्रा में नहीं चलती थी।

अगर बाला साहब की पर्सनल लाइफ देखा जाए तो सरला वैद्य से इनकी पहले शादी हुई जिनकी मृत्यु 1995 मे हो हुई, जिनसे तीन पुत्र हुए (I) बिंदुमाधव जिनकी कार दुर्घटना मे मृत्यु हो गई (ii) जयदेव ओर (iii) उद्धव जिन्हें सारा राज्य सोंप दिया गया। उद्धव के बेटे हैं आदित्य जिनके बारे मे कहा जाता है की अब ये शिव शेना के अगले उत्तराधिकारी हैं।

 

दोस्तों कहा जाता है की मुंबई कभी रुकती नहीं है लेकिन 17 नवम्बर 2012 को 86 वर्ष के बाला साहब की जब हर्ट अटैक से मृत्यु हुई सारा मुंबई थम सा गया, शिवाजी पार्क में पब्लिक फ़्यूनीरल हुआ जो इनसे पहले किसी का नहीं हुआ केवल बाल गंगाधर तिलक का हुआ था। पूरी मुंबई में RPF जवान को तैनात किया गया ताकि कोई घटना ना हो, इन्हें 21 तोपों की सलामी दी गई जो केवल प्रधान मंत्री या राष्ट्रपति को ही दी जाती है, इसके वाबजूद इन्हें दिया गया। ये चाहते तो बहोत बड़े पोलिटिसियन बन सकते थे लेकिन हमेसा इनहोने किनारा किया।

Bala Saheb Thakrey |  बाला साहब ठाकरे

Bala Saheb Thakrey
Bala Saheb Thakrey

लाखों लाख लोगो ने इनकी आखरी दर्शन किए, मुंबई की सड़को पे इससे पहले कभी इतना बड़ा जन शैलब नहीं उतरा था, लोग हर हाल में बाला साहब की आखरी झलक पाना चाहते थे, सड़क के पास कोई ऐसी इमारत नहीं थी जो पुरुषों-महिलाओं-बच्चों से भरी ना हो, हर कोई बाला साहब के अंतिम यात्रा का गवाह बनना चाहते थे, लोग “दोपहर का सामना” पेपर को लहरा रहे थे जिसका पहला पन्ना काला रंग से पोता हुआ था ओर लिखा था “अपने बाला साहब चले गए”, पूरी मुंबई ने नम आँखों से इन्हें विदाई दी। ओर इस तरह एक युग का अंत हुआ। तो ये कहानी थी शेर ए हिंदुस्तान बाला साहब ठाकरे की, जिन्हें आज भी लोग बाल ठाकरे नहीं बल्कि बाला साहब कह के संबोधित करते हैं।


Post a Comment

0 Comments

Credit Card | Debit Card | Visa | MasterCard | RuPay में क्या difference है?